Friday, April 2, 2010

मय की मदहोशी..

इन पंक्तियों को सुबह मैंने अपने mailbox में पढ़ा.. mailed by Me only
No idea when I wrote them and mailed to myself last night :)

मय को क्यूँ.. तुम किये बदनाम जा रहे हो,
हकीकत ही तो है यही.. जो तुम बयान किये जा रहे हो|

Some more from another mail written last night..

बिछड़े यार अब पुराने हो चले, वक़्त ने कहा.. यादों का सहारा लो..
यादों ने कहा.. अब हम भी बेगाने हो चले...

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